મનપસંદ કવિતા : मैं लापता रहा (અજ્ઞાત)
औरों से नहीं मेरे साथ फ़ासला रहा
दरवाज़ा मेरे घर का मुज ही से खफा रहा
तुमने कभी भी उस की तरफ़ गौर ना किया
जो शख्स तुम को जिंदगीभर चाहता रहा
उमीद आने की नहीं, वादा भी नहीं है
फिर किस के लिए रातभर मैं जागता रहा
जब भी किसी भी मोड़ पे एक जिंदगी मिली
एक अजनबी सी आँख लिए ताकता रहा
तुम को युँ ढूँढने में कहाँ तक निकल गया
ना जाने कितने साल तक मैं लापता रहा
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