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કોઇ નઝમ ૫૩

वो नाराज़ हैं हमसे कि हम कुछ लिखते नहीं;

कहाँ से लाएं लफ्ज़ जब हमको मिलते नहीं;

दर्द की ज़ुबान होती तो बता देते शायद;

वो ज़ख्म कैसे दिखाए जो दिखते नहीं।