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माँ

एक पेड़ जिसने कभी धूप लगने ना दी ,
अपने आँचल में छुपा के नज़र किसीकी लगने ना दी,
याद आते है बचपन के दिन जब तू मुजे खिलाती थी,
हर बार रोने पर तू ही मुझे हँसाती थी ।

अच्छी नींद के लिए वह
नयी कहानियाँ सुनाती थी,
रो पड़ता है दिल याद करके ,
जब हाथो से अपने खाना खिलाती थी,

तेरी उंगली पकड़ के मैंने चलना सिखा,
तेरी आँखों से मैंने से यह संसार में देखा,
भगवान् ना आ सका इस लिए
शायद तुझे मेरे लिए भेज दिया।

आज फिर तेरी गोद में सोने को दिल करे,
तेरे हाथो से खाने को दिल बेकरार है,
याद आ गेर वोह सुनहरे दिन
दिल आज भी उस समय मे जाने को बरकरार है ।

बस अब याँदे ही रह गयी याद करने को
बचपन लोट के तो आ नही सकता ,
तेरे अनगिनत एहसानो का बदला
में किसी भी जनम मे चुका नही सकता ।